दूसरी आज़ादी उपन्यास



कितनी लड़ाइयां कितनी बार

 ‘रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास

 'दूसरी आज़ादी’ 

सुरेश पंडित

 ‘इतिहास तो हर पीढ़ी लिखेगी/बार बार पेश होंगे/मर चुके/जीवितों की अदालत में/बार बार उठाए जायेंगे/कब्रों में कंकाल/हार पहनाने के लिए/ कभी फूलों के/कभी कांटों के/समय की कोई अंतिम अदालत नहीं/और इतिहास आखिरी बार नहीं लिखा जाता।’ 

पंजाबी कवि सुरजीत पातर की कविता का यह हिन्दी अनुवाद इतिहास के बारे में फैलाए गये बहुत से मिथकों का खंडन करता है। कोई भी इतिहास समग्रतः सच्चा नहीं होता। इसलिए वह बार बार लिखा जाता है। बार बार गड़े मुर्दे उखाड़ जाते हैं और उनकी कारनामों पर समय की अदालत में फैसले लिए जाते हैं। रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘दूसरी आज़ादी’ भी इस सच को पकड़ने की एक बेचैन कोशिश है। शीर्षक से जाहिर होता है कि इसमें उस पहली आज़ादी के बाद का इतिहास है, जिसे पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में काफी संघर्षो और कुर्बानियों के बाद हासिल किया गया था। उसके बाद आज तक सत्ता  के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ी गई हैं और आगे भी लड़ी जाती रहेंगीं क्योंकि सत्ता  चाहे सामंतशाही की हो या लोकतांत्रिक उसका चरित्र प्रायः एक सा होता है। इसलिए इस तरह की लड़ाइयों के क्रम का कभी अंत नहीं होता। उपन्यास में आज़ादी से पहले इसे पाने के लिए लोगों को जिस तरह के आकर्षक सपने दिखा कर संघर्ष हेतु तैयार किया गया था उसका और बाद में उन सपनों को किस तरह तोड़ा गया इसका वर्णन बड़ी संवेदनात्मक भाषा में किया गया है। साथ ही खोई आज़ादी को पुनः पाने के लिए किए गये प्रयासों को भी दर्शाया गया है। लगता है हमारे देश के सारे इतिहास आम लोगों को सपने दिखाने और उन्हें तोड़ने के प्रयासों को ही लेकर लिखे गये हैं। उपन्यास के सभी पात्र चाहे वे नायक हों या खलनायक, पहली आज़ादी के संघर्षों की उपज हैं फिर चाहे उन्होंने एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उसमें भाग लिया हो या उसके विरोध में अथवा एक तटस्थ दर्शक के रूप में। नायक इस उपन्यास का रणविजय भी हो सकता है, रामदयाल भी और रामप्यारे भी। क्योंकि तीनों एक दूसरे के पूरक हैं। ये सब मिलकर एक चरित्र बनते हैं। आज़ादी के बाद इस लड़ाई में शरीक होने वाले लोग दो वर्गों में बट जाते हैं। एक में वे लोग होते हैं जो किसी न किसी रूप में सत्ता  से जुड़ जाते हैं। एक में वे लोग होते है जो इससे अलग तो रहते हैं लेकिन आगे क्या करें की दिशाहीनता में गोते लगाते नज़र आते हैं। पहली तरह के लोग गॉधी का मुखौटा लगाकर सत्ता  सुख भोगने में लग जाते हैं और दूसरे, गॉधी की राह पर चलकर आगे क्या किया जा सकता है की सोच में उलझ जाते हैं। रणविजय एक शाही परिवार के सदस्य हैं लेकिन इसलिए महल से निकाल दिए जाते हैं क्योंकि वे एक ऐसी लड़की से प्यार कर शादी कर लेते हैं जो एक अंग्रेज पिता और भारतीय मॉ की संतान है। इसी तरह उनके भाई भैया राजा रियासत में रणविजय को हिस्सेदारी से इस आधार पर वंचित कर देते हैं क्योंकि वे भूतपूर्व राजा की दूसरी पत्नी की संतान हैं अर्थात भाई होकर भी सगे भाई नहीं हैं। यद्यपि दोनों ही आरोप सही हैं फिर भी उन्हें कानूनन उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। लेकिन रणविजय अपने हक़ के लिए स्वयं लड़ने को तैयार नहीं होते। यह शायद उन पर चले आ रहे गॉधी के चिंतन के प्रभावों का परिणाम है या वह भावुकता है जो गॉधी को लेकर बाद तक बनी रही थी। रामदयाल जी दोनों भाइयों के मित्र हैं वे इस तरह के अन्याय को सहन नहीं कर पाते फिर भी वे न तो भैया राजा का विरोध करते हैं और न ही रणविजय को भैया राजा का विरोध करने के लिए तैयार ही कर पाते हैं। नतीजा यह कि पहली आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने के कारण दोनों ही गॉधी के हैंगओवर से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाते। वैसे भी यह ऐसे लोगों का स्वभाव है कि वे तब तक कोई निर्णय नहीं लेते जब तक किसी आन्दोलन के लिए पुख्ता ज़मीन तैयार नहीं हो जाती। पहली आज़ादी की लड़ाई में भी शुरू में किसान, मजदूर और वंचित वर्ग के लोग ही शामिल हुए थे, मध्यम वर्ग तो तब आया था जब वह लड़ाई निर्णायक दौर में पहुंच गई थी। राजमहल से निष्कासित और पैतृक संपत्ता property  से वंचित हो जाने के बाद रणविजय और लिली दोनों लिली के घर आकर रहने लगते हैं। रणविजय एक गंभीर विचारक से दिखाई देते हैं जबकि लिली अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है। शायद यही वह कारण है जिससे वह रणविजय से शादी करती है और जब यह महसूस करती है कि रणविजय उसकी महत्वाकांक्षी प्रकृति को संतुष्ट करने में सहयोगी नहीं बन सकता तो वह नामदेव की ओर झुकती है। रणविजय और लिली के माता-पिता उसके इस झुकाव को पसंद नहीं करते। लेकिन उनकी अनिच्छा के बावजूद लिली अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए नामदेव के साथ रूस चली जाती है। समझ में नहीं आता कि इतनी चंचल चित्त  और महलों में रहने की इच्छा पालने वाली युवती के साथ रणविजय विवाह क्यों कर लेता है। वैसे लिली बौद्धिक रूप से काफी जागरूक है, गंभीर विषयों पर होने वाली चर्चाओं में वह भाग ले सकती है और रूसी साहित्य का अनुवाद तो वह करती ही है। फिर भी वह अथाह प्रेम करने वाले रणविजय और अपने माता-पिता को छोड़कर क्यों चली जाती है? यह समझना कोई मुश्किल नहीं है। दरअसल उसे लगता है कि नामदेव के साथ रहने पर उसके सपने पूरे हो सकते हैं उसकी प्रकृति और प्रवृत्त  दोनों परस्पर विरोधी भावों से बनी है। अन्त में उसका क्या होता है पता नहीं लगता। हो सकता है कि उपन्यासकार ने उसे इसलिए रचा हो कि वह पाठकों के लिए पहेली बनी रहे या फिर आगे वही हुआ जो प्रायः जो इस प्रकार के मामलों में हुआ करता है। रणविजय के बजाय रामदयाल का चरित्र अधिक परिपक्व व डायनामिक है। यद्यपि एक रात को लिली के साथ घटी धटना का विश्लेषण कर पाना काफी कठिन है। कहीं नहीं लगता कि दोनों का इस तरह का पारस्परिक कभी रहा हो, हो सकता है यह आकस्मिक भावावेग मात्र रहा हो। चरित्र का यह आकस्मिक विचलन इस बात को लेकर भी हो सकता है कि हम एक दूसरे के साथ रहकर और घनिष्ठ संबध बनाकर भी आपस में सारी जानकारी नहीं रख पाते। मानव मन के बारे में किसी भी प्रकार की भविष्यवाणी प्रायः अनुमाननीय होती है। प्रसिद् अंग्रजी उपन्यासकार ‘सौमट सेर माम’एक जगह लिखते हैं... ‘मैं किसी पात्र को जैसा सोचकर रचता हूं केई बार उसका आचरण मेरी कल्पना के अनुरूप नहीं होता’। फिर इस घटना पर किसी और से कोई प्रतिक्रिया का न होना भी हैरानी पैदा करता है। क्या यह कोई ऐसी घटना थी जिसे सामान्य मानकर भुला दिया जा सकता था। दोनों में से कोई भी न इसके बारे में आत्मग्लानि महसूस करता है न आत्मिक संतृप्ति ही प्रकट करता है। सरकारी जमीनदारी उन्मूलन कार्यक्रम को विभिन्न हथकंड़ों से क्रियान्वित न होने देने के प्रयासों का रामदयाल, रणविजय और रामप्यारे के साथ मिलकर विरोध करता है। वह स्वयं भी एक छोटा-मोटा जमीनदार हैं अपने आन्दोलन को प्रामाणिक बनाने के लिए पहले वह अपनी जमीन को अपने अधिकार क्षेत्र के किसानों में बांट देता है। यद्यपि इसके लिए उसे अपनी पत्नी और अन्य संबधियों का भारी विरोध सहन करना पड़ता है। जब भैया राजा सहित सारे जमीनदार एकजुट हो जमीनदारी उन्मूलन कार्यक्रम के राह में रोड़े अटका राहे होते हैं तब रामदयाल का यह कदम लोगों का मन जीतने वाला साबित होता है। गॉधी जी किसी भी काम की शुरूआत अपने से करते थे इसी लिए जनता उनका साथ देती थी। यहां भी लोग रामदयाल का साथ इसी लिए देते हैं। रणविजय और रामप्यारे तो पहले ही सर्वहारा थे। उनके पास अपना कुछ भी नहीं था। इसलिए तीनों का नेतृत्व आमजन को बदलाव की राह दिखाने में उत्साहजनक साबित होता है। भैया राजा का चरित्र शुरू में जैसा दिखाया जाता है अंत तक वैसा ही बना रहता है। वह पहले सारी रियासत पर अपना एकक्षत्र प्रभुत्व स्थापित करने की राह में कांटा बन सकने वाले अपने ही भाई रणविजय को दरकिनार करता है। फिर कांग्रेस में शामिल होकर रामदयाल और कांग्रेस के जिलाध्यक्ष को एक तरफ खड़ा कर देता और स्वयं विधानसभा का टिकट प्राप्त कर लेता है। तरह तरह की तिकड़मों से वह चुनाव जीत भी लेता है। अपनी ऐययाशी के लिए देवी स्वरूपा अपनी पत्नी के चरित्र पर आरोप लगाकर वह उसे महल से निकाल देता है और एक मेम को ले आता है। मेम के गर्भिणी हो जाने पर वह बच्चे को गिरवाना चाहता है जब मेम इसके लिए तैयार नहीं होती तो उसे राह से हटाने का षडयंत्र रचता है। पर मेम उसकी चंगुल से निकल कर रामदयाल के जमीनदारी विरोधी आन्दोलन में शरीक हो जाती है। आखिर भैया राजा की जमीनदारी के विरूद्ध संघर्ष इतना तेज हो जाता है कि उसे रोकने की सारी चालें असफल हो जाती हैं। आश्चर्य है लिली का चरित्र जिस तरह उपन्यास में दिखाया गया है उसके माता-पिता से किसी भी रूप में नहीं मिलता। उसकी मॉ जो एक भारतीय माता-पिता की संतान है एक अंग्रेज से शादी करने के बावजूद अंत तक एक पतिपरायण आदर्श भारतीय नारी बनी रहती है। अंग्रेज पति उसके समर्पण और त्याग से अभिभूत दिखाई देता है। वह मन ही मन अंग्रेज औरतों से उसकी तुलना करता है और पाता है कि दोनों में कोई मुकाबिला नहीं किया जा सकता। ब्रिटिश राज के जमाने में वह प्रशासनिक अधिकारी रहा था। गॉधी और उनके अनुयायियों से यहां की संस्कृति से, यहां के लोगों के छल-कपट विहीन स्वभव से वह इतना प्रभावित हो जाता है कि इन्गलैन्ड जाने के बजाय वह यहीं रह जाने का फैसला कर लेता है। यहां के पुरातन साहित्य का अध्ययन करने और उसका अंग्रेजी में अनुवाद करने में वह स्वयं को झोंक देता है। दोनों रूस जाने के लिली के फैसले से आहत तो होते ही हैं लेकिन वह भी जानते हैं कि उनके किए कुछ होने जाने वाला नहीं है। परिणामस्वरूप वे लिली के इस कार्य को धीरे धीरे भुला देते हैं। और अपने अपने कामों में लग जाते हैं। रणविजय के प्रति उनका व्यवहार अत्यंत स्नेहपूर्ण बना रहता है। पहली आज़ादी का आम लोगांे पर जादू एक डेढ़ दशाक तक चलता रहता है इसकी एक वजह तो यह है कि उनमें यह उम्म्ीद बनी रहती है कि उनके दिन बदलेंगे और वे सपने जो पहले दिखलाए गये थे पूरे होंगे। दूसरा कारण यह भी था कि उस समय में सरकार की बागडोर उन लोगों के हाथ में रही जो स्वतंत्रता सेनानी रहे थे और आम लोगों के हालात सुधारने की कम से कम आशायें बनाये रखने वाले थे। फिर उनके चरित्र भी बेदाग थे। वे अपने त्याग और देशभक्ति के कारण जनता के हृदय में इतना मोहक स्थान बनाये हुए थे कि चुनावों में बिना धन-बल और बाहु-बल का प्रयोग किए जीत जाते थे या उनके विरूद्ध खड़ा होने की कोई हिम्मत ही नहीं दिखा पाता था। जो कुछ गड़बड़ियां या स्वार्थसिद्धियां हो रही थीं उन लोगों की ओर से हो रही थीं जो आज़ादी के पहले तक तो अंग्रेज सरकार के कृपापात्र थे लेकिन जैसे ही हवा पलटी कांग्रेस में आ गये और जोड़-तोड़ कर सŸाा के गलियारे में भी पहुंच गये। वे अन्याय, भ्रष्टाचार और दमन पहले भी करते थे और बाद में भी जारी रखे रहे थे। इन परिस्थितयों ने लोगों का स्वप्न भंग किया। उन्हें लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है। सत्ता  हमेशा भ्रष्ट, अन्यायी व दमनकारी होती है। उस पर विश्वास करना मूर्खता है। इस लिए इसके विरूद्ध निरंतर आन्दोलन करते रहने की जरूरत है। सरकारें जनदबाव के सामने ही झुकती हैं। जरा सी भी ढील देना उन्हें निरंकुश बनने का अवसर देना है। लेकिन सवाल यह है कि आन्दोलन की निरंतरता कैसे बनी रहे? देश के कुछ लोग तो इतने संतोषी हैं कि उन्हें दिन में एक बार भी रोटी मिलती रहे तो उन्हें और कुछ नहीं चाहिए। कुछ लोग सक्रिय हो सकते हैं लेकिन उन्हें जीविकोपार्जन से ही फुर्सत नहीं मिलती। बाकी वे लोग हैं जिन्हें हर तरह की सुविधायें मिली हुई हैं। उन्हें किसी तरह के बदलाव की जरूरत नहीं है। बल्कि उनकी तो हर मुमकिन कोशिश यही रहती है कि इसी तरह की यथास्थिति बनी रहे ताकि वे सुख भोगते रहें। पहली और दूसरी आज़ादी की लड़ाइयों के बावजूद देश की स्थितियों में वह परिवर्तन नहीं आया जिसके लिए वे लड़ी गईं थीं इन दोनों के बाद राममनोहर लोहिया व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई जिन्दगी भर लड़ते रहे पर व्व्यवस्था पहले जैसी ही बनी रही। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भी एक लड़ाई लड़ी गईं उसमें जीत हासिल कर लेने के बाद भी हालात वही बनी रही। अन्ना हजारे इसी तरह की एक लड़ाई छेड़े हुए हैं (वह भी सत्ता  की माया में दब गया) देखना है कि उसका अंजाम क्या होता है? इमरजेन्सी के बाद से देश में जहां तहां अनेक छोटे-बड़े आन्दोलन होते रहे हैं और अब भी हो रहे हैं, ये जनता को प्रभावित करने वचाले मुद्दों को लेकर हो रहे हैं। इनमें व्यवस्था परिवर्तन की जगह व्यवस्था में रहते हुए ही कुछ बदलाव लाने की कोशिशें हो रही हैं। भूमण्डलीकरण ने इस तरह पूंजीवाद के विरूद्ध पनपने वाले जनाक्रोश को टुकड़ों में बाट कर मुख्य लड़ाई का रूख बदल दिया है। रामनाथ शिवेन्द्र एक जमीनी स्तर के सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने विभिन्न आन्दोलनों में भाग लिया है और अब भी संघर्ष-रत हैं। तीन उपन्यासों के बाद उनका यह चौथा उपन्यास है। कुछ कल्पना, कुछ यथार्थ और कुछ जमीनी अनुभवों का उपयोग करते हुए इसका कथानक बुना गया है। यह चाहे पूरी तरह इतिहास सम्मत न हो पर उस समय के लोगों की मनःस्थिति को, और अन्यायी व्यवस्था को बदलने की तड़प को वाणी देने की कोशिश जरूर करता है।

 प्रकाशित- नया सबेरा.... 2010 

समीक्ष्य कृति-   ' दूसरी' आज़ादी '----- पिलग्रिम्स प्रकाशन, वाराणसी

B-27/98 A--8, Durgakund, Varanasi-221010

 Contact---(91-542) 2314060    email-pilgrims@satyam.net.in



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